एक अध्याय खत्म हुआ


   18मई, 2017, मेरी परास्नातक की आखिरी परीक्षा समाप्त हो गयी. 20 मई, 2017, मैंने जापान फाउन्डेशन में अपने पहले बैच के छात्रों को प्रमाणपत्र सुपुर्द करके अलविदा बोला दिया. ये मेरे जापानी अध्यापक के रूप में पहला छात्रों का ज़खीरा था. तो कुल मिलाकर मेरा अध्यापन का एक और सत्र समाप्त हुआ. तो चलो पहले बात करतें हैं अपने परास्नातक अध्यापन की. जुलाई, 2016 से मई 2017 तक चले लगभग एक साल के इस सफ़र में हसीन पल ढेर सारे मिले, लेकिन चुनौतियाँ भी कमतर नहीं थीं. जापानी भाषा में मास्टर डिग्री की ये पढ़ाई का सफर बहुत ही चुनौतीपूर्ण रहा है. सबसे बड़ी चुनौती ये है कि आप ऐसे जगह खड़े हुए हैं कि जहाँ आपको नकारात्मक बातों पर कोई ध्यान नहीं देना है. इस चीज़ से जो पार पा पाए वही असली साधू कहलाये. तो परास्नातक के स्तर को भी बनाए रखना एक और चुनौती थी. जोकि खुद की समीक्षा करने पर शून्य का एहसास होता है. अध्यापकों की आशाओं पर भी खरा उतरना एक और चुनौती. ज्यदातर लोग इस क्षेत्र में तीन या चार साल के बाद अच्छी सी नौकरी करते हैं. लेकिन जब हमने आगे पढने का बीड़ा उठा ही लिया है तो चुनौतियों ये क्यूँ घबराना. हांलांकि स्वयं को स्वयं से जीतना ही सबसे बड़ी चुनौती है.

   आगे मैं आपको अपने मास्टर डिग्री के हुए एक साल के जश्न में शरीक करना चाहूँगा. यहाँ केवल दुखों की ही बातें नहीं होंगी. यहाँ बातें होंगी कुछ खुशी के पलों की भी. तो जापनी भाषा के मास्टर डिग्री की शुरुआत की गयी थी पिछले साल जुलाई 2016 में. और हमारी कक्षा में मात्र 4 लड़के ही थे. लड़कियों का कोई नामो निशाँ नहीं. पहले समेस्टर हमने उच्च स्तर जापानी भाषा, जापानी साहित्य के अनुवाद, जापान का इतिहास और जापानी बोलने के तरीके के बारे में पढ़ाई की. ईश्वर की कृपा से इसी बीच मुझे जापान जाने का सुअवसर मिल गया. काफी खुशी और उन्माद में पढ़ाई से ध्यान विचलित हो गया और पहले समेस्टर में 2 विषयों में मेरे बैक पेपर आ गये हैं. किसी तरह दूसरी समेस्टर में मैंने छलांग लगा ली. और अब पारी थी जापानी साहित्य के इतिहास, जापानी समाज, जापान की अर्थव्यवस्था और पुरानी जापानी की पढ़ने की प्रणाली. ये सारे विषयों में से जो दो विषयों में मेरी रूचि थी वो जापान की अर्थव्यवस्था और पुरानी जापानी की पढ़ने की प्रणाली थी. लेकिन दुर्भाग्य से मैं इन विषयों में खरा नहीं उतर पाया. परीक्षा में अच्छे स्तर का प्रदर्शन नहीं कर पाया. बाकी बचे दो विषयों में भी उतना ख़ास प्रदर्शन नहीं हो पाया. दुखी हूँ अपने स्वयं के प्रदर्शन से जोकि दिनोदिन गर्त की ओर जा रहा है. कमी बस वही एक अभ्यास और लगन की कमी में गिरावट की वजह है.

 इस रास्ते को चुनते समय सबकी बातों को नज़रंदाज़ करके मैंने इसी विषय में कुछ करने की ठानी थी. पर दुर्भाग्य से जिसका डर था वही सब हो रहा है. लेकिन शायद ये भी एक दौर आता है जब आप किसी विदेशी भाषा का अध्यापन करते हैं. जिस तरह कक्षा 8 तक की गणित में मज़ा आता है ठीक उसी तरह जापानी के शुरूआती दौर में बहुत मज़ा आता है. लेकिन खुद के लिये ये सबसे बड़ी चुनौती होती है कि आप उस नयेपन और जोश को बरकरार रखो.

बस एक सोच मन लेकर चलना है-


रस्ते में आने वाले ठोकर से डरो नहीं,

चौकस रहो और चौकन्ना भी,

गर लड़खड़ाकर गिर भी जाओ

तो घबराओ नहीं

उठो, सीखो और पार कर जाओ.

फिर  अपनी मंजिल तक पहुँच जाओ.

ध्यान रहे एक बात का बस—

ये जंग जो है केवल खुद से है.

खुद को अच्छा करके दिखाना है

यही हर मंजिल की कहानी है...   


हार नहीं मानेंगे, उठेंगे, सीखेंगे, लड़ेंगे और जीतेंगे.

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